देने वालों ने दी हैं आहुतियाँ,
प्राणों की देश की खातिर
और देश की प्राणों के लिए भी।
दी गई हैं आहुतियाँ प्रेम की प्रेमों की खातिर
और प्रेमों की प्रेम के लिए भी।
आहुतियाँ वाचंबध्हता की खातिर
आहुतियाँ कर्म्बध्हता की खातिर।
देने वालों ने दी हैं आहुतियाँ
स्वयं की औरों की खातिर और
औरों की दी गई हैं आहुतियाँ स्वयं के लिए भी।
आहुतियाँ जीवन की मृत्यु के अमरत्व की खातिर
और मन की आहुतियाँ मस्तिष्क के जीवन के लिए भी
दी जाती हैं और जाती रहेंगी आहुतियाँ संसार की गतिशीलता की खातिर
और गतिरोध के लिए भी।
Tuesday, July 6, 2010
अभिलाषित प्रश्न
उठती आवाज़ दबा देते हो,
क्यों प्रियवर मेरे ?
क्यों कभी शामिल कर खेल में अपने,
कभी मुझे अहसास दिला कर सब चेहरों की बाहरी रंगत,
लहकती आग बुझा देते हो ,
क्यों प्रियवर मेरे?
पनप उठती है व्याकुलता कभी,
ह्रदय चंचल हो उठता है,
शांतचित्तता की पृष्ठभूमि तब
जाने कब मुझमे समां देते हो,
क्यों प्रियवर मेरे?
निर्जर गलियों की सीमाएं
तोड़ कभी मैं खो जाती जब
पुलकित सीमा के असीम गगन में ,
हाथ पकड़ मेरा ,आनंद से
फिर बाहरमुझे बुला लेते हो
क्यों प्रियवर मेरे?
चमकती धुप को छु कर ,
तरंगित हो उठता रोम रोम मेरा,
उसी क्षण मुझमे बिजली की कौंध
क्यों जगा देते हो?
क्यों ?प्रियवर मेरे।
क्यों बहने नहीं देते मुझको
चंचल हवा के थपेड़ों में,
या फिर गोते लगाने देते
लरजती लहरों की शिथिल गहराई में,
या फिर,
क्यों नहीं सुला लेते मुझको
अपनी ही परछाईं में,
क्यों? प्रियवर मेरे।
क्यों प्रियवर मेरे ?
क्यों कभी शामिल कर खेल में अपने,
कभी मुझे अहसास दिला कर सब चेहरों की बाहरी रंगत,
लहकती आग बुझा देते हो ,
क्यों प्रियवर मेरे?
पनप उठती है व्याकुलता कभी,
ह्रदय चंचल हो उठता है,
शांतचित्तता की पृष्ठभूमि तब
जाने कब मुझमे समां देते हो,
क्यों प्रियवर मेरे?
निर्जर गलियों की सीमाएं
तोड़ कभी मैं खो जाती जब
पुलकित सीमा के असीम गगन में ,
हाथ पकड़ मेरा ,आनंद से
फिर बाहरमुझे बुला लेते हो
क्यों प्रियवर मेरे?
चमकती धुप को छु कर ,
तरंगित हो उठता रोम रोम मेरा,
उसी क्षण मुझमे बिजली की कौंध
क्यों जगा देते हो?
क्यों ?प्रियवर मेरे।
क्यों बहने नहीं देते मुझको
चंचल हवा के थपेड़ों में,
या फिर गोते लगाने देते
लरजती लहरों की शिथिल गहराई में,
या फिर,
क्यों नहीं सुला लेते मुझको
अपनी ही परछाईं में,
क्यों? प्रियवर मेरे।
आम इंसान का सच
अनगिनत बन्धनों में जकड़ा मेरा मन,
जब तोड़ न पाता एक भी,
लौट जाता बन्धनो की राह,
जहाँ से मूह मोड़ कर चला था।
उन्ही कारागारों में ढूंढ़ता निकलने की राह,
जहाँ बरसों से जकड़ा पड़ा है।
और उलझ कर रह जाता चंद सिक्करों के बीच ,
तलाशता किसी कमज़ोर कड़ी को,
मचलता की नियंत्रण पाले उस शिकंजे पर।
अधीर,जब शिथिल पड़ता , तो पाता शिकंजे
दृढ़ता से कसे हुए इर्द गिर्द अपने।
अधीनता का आदि,
तोड़ न पाया मोह के चंद बंधन ,
अनगिनत बन्धनों में जकड़ा मेरा मन।
जब तोड़ न पाता एक भी,
लौट जाता बन्धनो की राह,
जहाँ से मूह मोड़ कर चला था।
उन्ही कारागारों में ढूंढ़ता निकलने की राह,
जहाँ बरसों से जकड़ा पड़ा है।
और उलझ कर रह जाता चंद सिक्करों के बीच ,
तलाशता किसी कमज़ोर कड़ी को,
मचलता की नियंत्रण पाले उस शिकंजे पर।
अधीर,जब शिथिल पड़ता , तो पाता शिकंजे
दृढ़ता से कसे हुए इर्द गिर्द अपने।
अधीनता का आदि,
तोड़ न पाया मोह के चंद बंधन ,
अनगिनत बन्धनों में जकड़ा मेरा मन।
एक सत्य ये भी
क्या खोना है क्या पाना,
इसे ही जीवन को है दर्शाना,
चूक हुई इसमें कहीं तो ,
बस आंसू ही है बरसना।
क्यूंकि जीवन बहुत बड़ा है,
आदि और अंत कहाँ है,
सुख की अनुभूति छोटी है ,
यहाँ तो दुःख का घड़ा ही है भरा।
यह रहस्य नहीं सच्चाई है,
ज़िन्दगी आकाश और खाई है।
राही बहुत हैं , क्षण भर का साथ है,
पड़ाव आया ,बस वहीँ तक की बात है।
कौन यहाँ किसका है ,किसकी यहाँ chhah है,
अपनी मंजिल आई फिर सुनता कौन आह है।
इसे ही जीवन को है दर्शाना,
चूक हुई इसमें कहीं तो ,
बस आंसू ही है बरसना।
क्यूंकि जीवन बहुत बड़ा है,
आदि और अंत कहाँ है,
सुख की अनुभूति छोटी है ,
यहाँ तो दुःख का घड़ा ही है भरा।
यह रहस्य नहीं सच्चाई है,
ज़िन्दगी आकाश और खाई है।
राही बहुत हैं , क्षण भर का साथ है,
पड़ाव आया ,बस वहीँ तक की बात है।
कौन यहाँ किसका है ,किसकी यहाँ chhah है,
अपनी मंजिल आई फिर सुनता कौन आह है।
प्रकृति में शांति है जहाँ ,
देखो वहीँ बहता वो झरना
अपनी कलकल से कैसी अशांति फैलता है ।
प्रकृति में प्रेम है जहाँ ,
देखो वहीँ सूखा वो पेड़ का पत्ता
कैसे परायेपन से तड़पता है।
प्रकृति में विश्वास है जहाँ ,
देखो वहीँ वो पौधा
अविश्वास से युक्त अकेला ही पनपता है ।
प्रकृति में एकता है जहाँ ,
देखो वहीँ वो कंकड़
सभी से ठोकर खाता है ।
प्रकृति में सम्पन्नता है जहाँ,
देखो वहीँ वो मति का टुकड़ा
विपन्नता में बंजर सा कदकता(कदकता) है
फिर ये शांति, ये प्रेम
प्रकृति इससे क्या सन्देश पहुंचती है,
क्यूँ ये निर्दयी होकर
किसी से विश्वास तो कहीं सम्पन्नता
छीन ले जाती है ।
क्या दोष है इसमें उस वर्ग का
जो सहनशीलता की प्रतिमूर्ति है
क्या वह मजबूर सा
मूक , मनुष्य की एक मूर्ति है।
या यह संवेदनहीनता है प्रकृति की
जिसमे मानव को समझने की क्षमता
जाती रही है।
या यों कह लें की सम्पूर्ण मनुष्य जाती भी
इसमें निपुर्नता से हाथ बताती रही है।
देखो वहीँ बहता वो झरना
अपनी कलकल से कैसी अशांति फैलता है ।
प्रकृति में प्रेम है जहाँ ,
देखो वहीँ सूखा वो पेड़ का पत्ता
कैसे परायेपन से तड़पता है।
प्रकृति में विश्वास है जहाँ ,
देखो वहीँ वो पौधा
अविश्वास से युक्त अकेला ही पनपता है ।
प्रकृति में एकता है जहाँ ,
देखो वहीँ वो कंकड़
सभी से ठोकर खाता है ।
प्रकृति में सम्पन्नता है जहाँ,
देखो वहीँ वो मति का टुकड़ा
विपन्नता में बंजर सा कदकता(कदकता) है
फिर ये शांति, ये प्रेम
प्रकृति इससे क्या सन्देश पहुंचती है,
क्यूँ ये निर्दयी होकर
किसी से विश्वास तो कहीं सम्पन्नता
छीन ले जाती है ।
क्या दोष है इसमें उस वर्ग का
जो सहनशीलता की प्रतिमूर्ति है
क्या वह मजबूर सा
मूक , मनुष्य की एक मूर्ति है।
या यह संवेदनहीनता है प्रकृति की
जिसमे मानव को समझने की क्षमता
जाती रही है।
या यों कह लें की सम्पूर्ण मनुष्य जाती भी
इसमें निपुर्नता से हाथ बताती रही है।
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