उठती आवाज़ दबा देते हो,
क्यों प्रियवर मेरे ?
क्यों कभी शामिल कर खेल में अपने,
कभी मुझे अहसास दिला कर सब चेहरों की बाहरी रंगत,
लहकती आग बुझा देते हो ,
क्यों प्रियवर मेरे?
पनप उठती है व्याकुलता कभी,
ह्रदय चंचल हो उठता है,
शांतचित्तता की पृष्ठभूमि तब
जाने कब मुझमे समां देते हो,
क्यों प्रियवर मेरे?
निर्जर गलियों की सीमाएं
तोड़ कभी मैं खो जाती जब
पुलकित सीमा के असीम गगन में ,
हाथ पकड़ मेरा ,आनंद से
फिर बाहरमुझे बुला लेते हो
क्यों प्रियवर मेरे?
चमकती धुप को छु कर ,
तरंगित हो उठता रोम रोम मेरा,
उसी क्षण मुझमे बिजली की कौंध
क्यों जगा देते हो?
क्यों ?प्रियवर मेरे।
क्यों बहने नहीं देते मुझको
चंचल हवा के थपेड़ों में,
या फिर गोते लगाने देते
लरजती लहरों की शिथिल गहराई में,
या फिर,
क्यों नहीं सुला लेते मुझको
अपनी ही परछाईं में,
क्यों? प्रियवर मेरे।
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