प्रकृति में शांति है जहाँ ,
देखो वहीँ बहता वो झरना
अपनी कलकल से कैसी अशांति फैलता है ।
प्रकृति में प्रेम है जहाँ ,
देखो वहीँ सूखा वो पेड़ का पत्ता
कैसे परायेपन से तड़पता है।
प्रकृति में विश्वास है जहाँ ,
देखो वहीँ वो पौधा
अविश्वास से युक्त अकेला ही पनपता है ।
प्रकृति में एकता है जहाँ ,
देखो वहीँ वो कंकड़
सभी से ठोकर खाता है ।
प्रकृति में सम्पन्नता है जहाँ,
देखो वहीँ वो मति का टुकड़ा
विपन्नता में बंजर सा कदकता(कदकता) है
फिर ये शांति, ये प्रेम
प्रकृति इससे क्या सन्देश पहुंचती है,
क्यूँ ये निर्दयी होकर
किसी से विश्वास तो कहीं सम्पन्नता
छीन ले जाती है ।
क्या दोष है इसमें उस वर्ग का
जो सहनशीलता की प्रतिमूर्ति है
क्या वह मजबूर सा
मूक , मनुष्य की एक मूर्ति है।
या यह संवेदनहीनता है प्रकृति की
जिसमे मानव को समझने की क्षमता
जाती रही है।
या यों कह लें की सम्पूर्ण मनुष्य जाती भी
इसमें निपुर्नता से हाथ बताती रही है।
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jharna agar bina awaz k bahe to kisi pyase ko pata nahi chalega ki kahin aaspass pani hai.andhere me koi gir bhi skta hai.jab aankhon ke vash me na ho tab baki ki indriyon ka istmal krna chahiye.isliye jharna ko blame mat karo...ki shor krta hai...
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