Wednesday, September 9, 2009

शब्दों में मोती पिरोये

शब्दों में मोती पिरोये,
हार तुम्हारी खातिर बनाया,
दाल गले में तुम्हारे इसे,
अपना सर्वस्वा तुम्हे लुटाया.

चरणों में स्थान बना कर,
बैठ गयी छित वहीँ लगा कर,
अंखियों की बरसात कराये ,
तुमको अपना मर्म सुनाया.


अधरों पर मुस्कान सजाये,
वाही मोहक चंचल चितवन,
देखती तुम्हे टकटकी लगाये,
कर गयी अंतर्मन अर्पण.

तुम

तुम फूलों पर गिरती बूँद से,
तुम आँखों से बहते अफसानो की धुंध से,
तुम घरौंदों में बसे खूबसूरत सपनो से,
तुम बहुत दूर रह कर भी लगते हो अपनों से,
तुम लेखनी हो मेरी कविता के,
तुम तरंगित आकृति हो मेरी तुलिका के,
तुम मर्म हो मेरे सोए हुए घावों के,
तुम चिराग हो मेरे खोये हुए भावों के,
तुम दीप्ति हो मेरी प्रज्ज्वलित आशा के,
तुम तृप्ति हो मेरे ह्रदय की भाषा के.

इस बात को गुज़रे हुए ज़माना बीत गया

इस बात को गुज़रे हुए ज़माना बीत गया,
तुम साँसों में बसा करते थे वो फ़साना बीत गया.
ज़माने ने मुक्कदर में लिख दिया नाम कोई बेगाना,
तुम मुक्कदर हुआ करते थे वो ज़माना बीत गया.
बगावत कर ली है मुझसे मेरे साजों ने भी,
तुम साजों में बजा करते थे वो तराना बीत गया.

सब पर तेरा एकाधिकार

ये मेरा सबकुछ तेरा है,
ये आत्मा,ये शरीर,
सब पर तेरा एकाधिकार.
तू अपने साये में रख ले छुपकर,
कहीं और अब सवेरा नहीं दीखता.
तेरी परछाई की चमकती धुप में,
पनाह दे दे मुझे.
सांस लेने दे खुल कर तेरी कासी बाँहों में,
अब हवाएं ताजी नहीं लगतीं.
देखने दे मुझे इन बंद आँखों से तेरी काय,
खुले पट से छान जाती है जगती तस्वीर.
मुझे रहने दे चरणों में तेरी,
नरम चादर पर नींद नहीं आती मुझे.
बाँध ले अपने स्नेहपाश में,
कहीं और ये प्यास बुझती नहीं अब.
तेरे बिना अधूरी मैं,
ये मेरा सबकुछ तेरा है,
सब पर तेरा एकाधिकार.

पुलकित ह्रदय

पुलकित ह्रदय,हर्षित मन मेरा,
दीप जलाये,लगाये ज्योति का डेरा!
बैठा,अनिमेष ताकता कृष्ण निशा में,
बेकल होकर, पावन अंचल थामने को तेरा!!

कब तक आत्मा की ये प्यास!
किस क्षण तक प्राणों की ये सांस!!
कब दरस तेरे पाएंगे नैन!
कब होगा मेरा सुखद रैन!!

अब रेट फिसलती मुट्ठी से, अनजानी नहीं मैं
अब और कब तक आजमाएगा!!
यूँ ही संसार की लीला को,
अब और सहा न जायेगा!!

द्रिस्ती कब मुझपर होगी तेरी,
कब शेन(shain) वो ऐसा आएगा!
जीवन की नैया पर लगाकर,
कब भवसागर तर जायेगा!!

Sunday, September 6, 2009

आँधियों को गुज़र जाने दो

आँधियों को गुज़र जाने दो,
पीपल की शाख लहलहाती रहेगी यूँ ही!
हिचकोले खाती हुई पत्तियां कभी सिसकती हैं तो क्या,
हरीतिमा इनकी मुरझाती नही!!

कभी ठंडे बयार को गले लगा कर,
लचकती अंगडाइयां भी लेती हैं ये!
और आनंद से झूम केर,
करती हैं अटखेलियाँ !!

सुबह की पहली किरण का स्पर्श पाकर,
बहकती हुई उल्लास में चमकती भी हैं!
और शाम की बोझिल पलकों पैर,
मधिम झोकों से अपनी देती हैं थपकियाँ!!

आँधियों की थाप से चोटिल ये पत्तियां रोटी हैं तो क्या,
हरीतिमा इनकी मुरझाती नही!
आंधियों को गुज़र जाने दो,
पीपल की शाख लहलहाती रहेगी यूँ ही!!