Wednesday, September 9, 2009

पुलकित ह्रदय

पुलकित ह्रदय,हर्षित मन मेरा,
दीप जलाये,लगाये ज्योति का डेरा!
बैठा,अनिमेष ताकता कृष्ण निशा में,
बेकल होकर, पावन अंचल थामने को तेरा!!

कब तक आत्मा की ये प्यास!
किस क्षण तक प्राणों की ये सांस!!
कब दरस तेरे पाएंगे नैन!
कब होगा मेरा सुखद रैन!!

अब रेट फिसलती मुट्ठी से, अनजानी नहीं मैं
अब और कब तक आजमाएगा!!
यूँ ही संसार की लीला को,
अब और सहा न जायेगा!!

द्रिस्ती कब मुझपर होगी तेरी,
कब शेन(shain) वो ऐसा आएगा!
जीवन की नैया पर लगाकर,
कब भवसागर तर जायेगा!!

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