शब्दों में मोती पिरोये,
हार तुम्हारी खातिर बनाया,
दाल गले में तुम्हारे इसे,
अपना सर्वस्वा तुम्हे लुटाया.
चरणों में स्थान बना कर,
बैठ गयी छित वहीँ लगा कर,
अंखियों की बरसात कराये ,
तुमको अपना मर्म सुनाया.
अधरों पर मुस्कान सजाये,
वाही मोहक चंचल चितवन,
देखती तुम्हे टकटकी लगाये,
कर गयी अंतर्मन अर्पण.
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अच्छा लिखा...टाइपिंग में कुछ गलतियां हैं, उनका भी ख़याल रखें. एक सुझाव भी...अच्छी हिंदी लिखने की धुन में भावों से ना भटकें...वैसे, अब तक ऐसा नहीं हुआ है, पर कभी-कभार शब्दों को थामे रखने के चक्कर में हम भाव भूल जाते हैं...कोशिश बेहतरीन है...बधाई और दुआ...।
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