Wednesday, September 9, 2009

तुम

तुम फूलों पर गिरती बूँद से,
तुम आँखों से बहते अफसानो की धुंध से,
तुम घरौंदों में बसे खूबसूरत सपनो से,
तुम बहुत दूर रह कर भी लगते हो अपनों से,
तुम लेखनी हो मेरी कविता के,
तुम तरंगित आकृति हो मेरी तुलिका के,
तुम मर्म हो मेरे सोए हुए घावों के,
तुम चिराग हो मेरे खोये हुए भावों के,
तुम दीप्ति हो मेरी प्रज्ज्वलित आशा के,
तुम तृप्ति हो मेरे ह्रदय की भाषा के.

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