अनगिनत बन्धनों में जकड़ा मेरा मन,
जब तोड़ न पाता एक भी,
लौट जाता बन्धनो की राह,
जहाँ से मूह मोड़ कर चला था।
उन्ही कारागारों में ढूंढ़ता निकलने की राह,
जहाँ बरसों से जकड़ा पड़ा है।
और उलझ कर रह जाता चंद सिक्करों के बीच ,
तलाशता किसी कमज़ोर कड़ी को,
मचलता की नियंत्रण पाले उस शिकंजे पर।
अधीर,जब शिथिल पड़ता , तो पाता शिकंजे
दृढ़ता से कसे हुए इर्द गिर्द अपने।
अधीनता का आदि,
तोड़ न पाया मोह के चंद बंधन ,
अनगिनत बन्धनों में जकड़ा मेरा मन।
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